पद से कमर तक

 

जब भी मैंने हनुमान जी को राम जी के साथ देखा ,या तो हनुमान जी राम जी  के चरणों में बैठे होते है , या राम जी से गले मिल रहे होते है , या फिर राम भक्ति में लीन रहते है I राम और हनुमान जी के स्नेह की कथा जग जाहिर है । 
जब राम जी पहली बार हमुमान जी से  मिले थे तो उन्होंने हनुमान जी को गले लगाया , इसके बाद हनुमान जी ने राम के चरणों में जगह पायी , इसका मतलब ये है की अपनी जगह श्री राम के चरणों में बना कर , हनुमान जी हमेशा के लिए राम के ह्रदय में बस गए । कितना सरल है हमारा सनातन धर्म ,कि चरण से सीधा हृदय में बैठा  देता है । 
ये बात तो हुई  बीते युग की ,अब बात करते है आज के समय की ,मुझे याद है जब भी हमारे यहाँ  कोई उम्रदराज या किसी बड़े बूढ़े का आना होता था, तब माँ और घर के समस्त सदस्य उनका आदर से पैर छूते थे । तरीका था ,अपने दोनों  हाथो से अपने बुजुर्गो के पैरो को छूकर आशीर्वाद लेना । अच्छा मैं तो यह भी पढ़ा है की नेपाल ,श्रीलंका और मॉरिशस में भी लोग दंडवत होकर प्रणाम करते थे, वो भी हिन्दू और बोध समुदाय के , दंडवत प्रणाम  केवल सम्मान नहीं अपितु पूर्ण समर्पण का भाव व्यक्त करता है  ,चलो हम थोड़े मॉडर्न हुए और हाथ पाऊँ तक पहुंच गए ।  

पर आज की बात करते है Zen Z ,good for work , but when it comes to follow our customs and traditions ,they are bit weak and  slow ,दिल  पे मत लेना ,यह लोग हमारी परम्पराओ को धकेल रहे है ,करते है ,परम्पराओं  का पालम , पर आधे मन से  या फिर कहे according to their own convenience . मै किसी कि बुराई नहीं कर रही हूँ , मुझे किसी के  आचरण  या व्यहार को लेकर कोई  टीका टिपण्णी नहीं  करनी , but their version is infamously famous. इसे 'बुराई' के नजरिये से न देखकर, अगर हम एक 'सांस्कृतिक संक्रमण' (cultural transition) के रूप में देखें ।
हम लोग और हमसे पहले वाली पीढ़ियां परम्पराओं को आस्था और अनुशाषन के नज़रिये से देखती थी पर युवा पीढ़ी इसे तर्क या logic से जोड़ती है ।हर बात को तर्क के तराज़ू में नहीं तौला जा सकता , अगर हर बात में तर्क ढूँढोगे तो जीवन का बहुत सा खूबसूरत हिस्सा पीछे छूट जायेगा और  रह जायेगा सिर्फ तर्क ।
मैंने केवल एक छोटे से पैर छूने के उदहारण से अपनी बात रखी है ,परम्पराओं को अगर अपनी सुविधा का चश्मा पहना दिया तो , पैर छूना एक checklist हो गयी , छूना था तो बस छू लिया ।
 अब जब भी किसी युवा पीढ़ी को प्रणाम और पैर छूते देखती हूँ ,तो लगता है हम तो ठीक सीखे थे पर शायद इनको सीखाने में चूक हो गयी । अब हाथ पैरो को नहीं पर घुटनो तक ही पहुंच पाते है , और ऐसा ज़्यादा लम्बे समय तक नहीं चलेगा ,ये हाथ फिर कमर तक पहुंच जायेंगे । 
बात छोटी भी नहीं है और न ही गंभीर ,बात है संस्कारो की, बचपन में जो सिखाया गया ,उसको भूलने कि । संस्कारो का भी अपना तौर तरीका होता है ,इसकी भी मान्यताये  , जब यही संस्कार मानव व्यवहार से गायब होकर किताबो ,चित्र और भाषण तक सिमट कर रह जाते है तो मन व्यथित हो जाता है ।अगर आप संस्कारी है ,तो उम्र के  किसी भी पड़ाव में हो ,चाहे आप किसी जनरेशन से वास्ता रखते हो , परम्पराओ  और संस्कारो के  खोने का दुःख ज़रूर  होता है ।  


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